मेघालय में तपेदिक के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभा रहीं महिलाएं

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के मिशन निदेशक रामकुमार एस. ने कहा कि राज्य ने टीबी जांच तेज कर दी है, जिससे टीबी के संभावित मामलों का पता लगाने में तेजी आई है।
मेघालय में तपेदिक (टीबी) के खिलाफ लड़ाई में महिलाएं अग्रणी भूमिका निभा रही हैं और सरकार ग्रामीणों को बीमारी की जांच के लिए प्रोत्साहित करने के सिलसिले में महिला स्वयं सहायता समूहों की मदद ले रही है। हर परिवार में कम से कम एक सदस्य महिला स्वयं समूह का हिस्सा है और परिवार पर उसका काफी प्रभाव है।
री भोई जिले के उपायुक्त अभिलाष बरनवाल ने बताया कि राज्य में इन समूहों का नेटवर्क बहुत मजबूत है। बरनवाल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि इन स्वयं सहायता समूहों में से एक महिला को सामुदायिक लैंगिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (सीजीएचए) के रूप में नियुक्त किया जाता है, जो आशा कार्यकर्ताओं की तरह संभावित टीबी रोगियों की पहचान करती है और उन्हें ‘स्क्रीनिंग’ के लिए निकटतम स्वास्थ्य केंद्र में भेजती है। हर गांव में एक सीजीएचए होता है।
उन्होंने कहा, ‘‘ये सीजीएचए ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रावधान के लिए एक प्रकार से आधार हैं। वे आशा कार्यकर्ताओं की जगह नहीं ले रहे, बल्कि उनकी सहायता कर रहे हैं। वे स्वास्थ्य से संबंधित मामलों में स्वयं सहायता समूहों की आवाज बन गए हैं।”
बरनवाल ने कहा, ‘‘वे तपेदिक, इसकी व्यापकता और जल्द से जल्द निदान के महत्व के बारे में बात करते हैं।’’ ‘पल्मोनोलॉजिस्ट’ और राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी), मेघालय की सहायक कार्यक्रम अधिकारीडॉ. अमिका जोन रिनजाह ने कहा कि इसके अलावा, मेघालय ने टीबी के खिलाफ लड़ाई को बढ़ावा देने के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों और सोशल मीडिया ‘इन्फ्लुएंसर्स’ के समर्थन की भी पहल की है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के मिशन निदेशक रामकुमार एस. ने कहा कि राज्य ने टीबी जांच तेज कर दी है, जिससे टीबी के संभावित मामलों का पता लगाने में तेजी आई है।
साल 2015 में, प्रति एक लाख में से 845 लोगों की टीबी जांच की जा रही थी। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1,911 प्रति लाख हो गई। डॉ. अमिका ने कहा कि पिछले चार वर्षों में तपेदिक से मृत्यु होने की दर 5 से 6 प्रतिशत रही है और हाल में इसमें गिरावट देखी जा रही है।
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