प्रगति यात्रा के सहारे चुनावी नैया पार उतारने की कोशिश में नीतीश

प्रगति यात्रा के ही दौरान नीतीश कुमार ने 20,000 करोड़ रुपये की 188 योजनाओं की घोषणा की, जिनमें 121 योजनाओं को मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिल चुकी है और उन्हें जमीनी हकीकत बनाने को लेकर तेजी से काम शुरू हो चुका है।
बिहार में विधानसभा चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। छह महीने बाद राज्य में चुनाव होने हैं। ऐसे में पक्ष और विपक्ष-दोनों ने चुनावी समर के लिए कमर कस लिया है। इन तैयारियों के बीच एक बात तय है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए एक बार फिर नीतीश कुमार की ही अगुआई में चुनावी मैदान में उतरने जा रहा है। पिछले साल नीतीश और लालू के मिलने की खबरिया कानाफूसी हो रही थी, उन्हीं दिनों पहले अमित शाह और बाद बीजेपी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, दोनों नीतीश के ही चेहरे पर चुनाव लड़ने का ऐलान करने में देर नहीं लगाई। वहीं विपक्षी खेमे की कमान बीमारी के बावजूद लालू यादव ने अपने हाथ में ले ली है।
जनता दल से अलग होकर जब से नीतीश कुमार ने अपनी अलग राह चुनी है, बिहार में ज्यादातर जंग लालू बनाम नीतीश ही रही है। सियासी इतिहास गवाह है कि जब भी लालू बनाम नीतीश की जंग होती है, लालू का जंगलराज के भूत का डर बिहार के लोगों को सताने लगता है। इस जंग में लालू की बनिस्बत नीतीश का चमकदार और सुलझा हुआ सामने आ जाता है और सियासी बाजी नीतीश की अगुआई वाले गठबंधन के ही हाथ लगती रही है। एनडीए अगर बिहार की सत्ता से अतीत में कभी दूर हुआ भी है तो उसकी वजह खुद नीतीश का उसका साथ छोड़ना रहा है।
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नीतीश कुमार की अगुआई में 2005 में बिहार की सत्ता पर एनडीए के काबिज होने के बाद बिहार की अराजक छवि में तेजी से बदलाव हुआ। शासन की गाड़ी पटरी पर लगातार आती गई। नीतीश के पहले बिहार में बिजली के दर्शन कभी-कभी होते थे, लेकिन बाद में हालात बदले। बिहार की सड़कें देश और दुनिया में अपनी बदहाली के लिए जानी जाती थीं, लेकिन नीतीश ने उन्हें भी बदला। लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिलों की सौगात मिली। कभी माफिया, अपहरण और वसूली के लिए बदनाम बिहार की छवि बदलने लगी। इसके बाद नीतीश कुमार की भी नई छवि बनी, उन्हें नया नाम भी मिला, सुशासन कुमार। पंद्रह साल बाद हुए विधानसभा चुनावों में नीतीश की पार्टी की सीटें घटीं। हाल के दिनों में उनके कुछ बयानों पर सवाल भी उठे, इसके बावजूद बिहार की राजनीति का सबसे चमकदार चेहरा अब भी नीतीश कुमार ही हैं। शायद यही वजह है कि एनडीए एक बार नीतीश कुमार के ही चेहरे के साथ मैदान में उतरने जा रहा है। एनडीए और जनता दल यू को लगता है कि इस जंग में इस बार सियासी कामयाबी दिलाने में मददगार नीतीश कुमार की प्रगति यात्रा ही हो सकती है। इसलिए सत्ताधारी खेमे की ओर से एक तरफ जहां विकास को मुद्दा बनाने की तैयारी है, वहीं विकास के सिलसिले में नए आयाम जोड़ने को लेकर तेजी से काम हो रहा है। इसी के तहत नीतीश सरकार सड़क और पुल निर्माण जैसे विकास कार्यों को ज़मीन पर उतारने की तैयारी तेज कर दी है।
एनडीए के साथ ही बिहार के सियासी जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह यात्रा बिहार के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। क्योंकि नीतीश सरकार की नीतियों की वजह से पहले से ही समूचे राज्य में बुनियादी सुविधाओं में तेजी से सुधार हो रहा है। अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ ही लोगों की राय जानने के लिए कुछ दिनों पहले से नीतीश कुमार ने राज्य में प्रगति यात्रा की। इस यात्रा के दौरान नीतीश ने राज्य के तमाम जिलों में लोगों से मिलकर उनकी समस्याओं को सुना और उनके समाधान के लिए सुनवाई की जगह पर ही अधिकारियों को सीधे निर्देश दिए। इस यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने बिहार के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी कीं। विशेष रूप से सड़क निर्माण, बाईपास और उच्चस्तरीय रेलवे ओवर ब्रिज की योजनाओं पर जोर दिया गया, ताकि राज्य में आवागमन की सुगमता बढ़े और यात्रा समय में कमी आए।
प्रगति यात्रा के ही दौरान नीतीश कुमार ने 20,000 करोड़ रुपये की 188 योजनाओं की घोषणा की, जिनमें 121 योजनाओं को मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिल चुकी है और उन्हें जमीनी हकीकत बनाने को लेकर तेजी से काम शुरू हो चुका है। इनमें से कई योजनाएं ग्रामीण सड़कों को बेहतर बनाने, उनका पुनर्निर्माण करने और उनकी हालत पहले की तुलना में और बेहतर बनाने को लेकर हैं। इस दौरान समस्तीपुर और मधेपुरा जिलों में महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। साथ ही, सीवान, छपरा, गोपालगंज और मुजफ्फरपुर जिलों में सड़क चौड़ीकरण, बाईपास और पुल निर्माण कार्यों के लिए भी भारी धनराशि स्वीकृत की गई है। सत्ताधारी खेमे का दावा है कि नीतीश कुमार की दूरदर्शी सोच और कड़ी मेहनत की वजह से बिहार का तकरीबन हर गांव पक्की और चौड़ी सड़कों से जोड़ा जा रहा है। बहुत सारी सड़कें तैयार भी हो चुकी हैं। जिनकी मदद से बिहार के किसी भी कोने से पहले की तुलना में राजधानी पटना पहुंचना कहीं ज्यादा आसान हुआ है। इसकी वजह से लोगों के समय और ईंधन की बचत हो रही है। नीतीश की अगुआई में 2010 में मिली दूसरी जीत में बेहतर सड़कों की बड़ी भूमिका रही। शायद यही वजह है कि नीतीश कुमार ने सड़कों और बुनियादी सुविधाओं के लिए खजाना खोल दिया है।
नीतीश के लिए चुनौती शराबबंदी बनी हुई है। सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार की वजह से शराब की तस्करी बढ़ी है। हालांकि शराबबंदी से महिलाएं खुश हैं। नीतीश को इस चुनौती से पार पाना होगा। वैसे प्रशांत किशोर जैसे उनके पुराने साथी विपक्षी खेमे की ओर से इसे बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। फिर भी कह सकते हैं कि बिहार की आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ा नीतीश सरकार का पहिया अब भी प्रमुख मुद्दा है। उम्मीद की जा रही है कि चुनावों की घोषणा होने तक नीतीश और बीजेपी इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित और विस्तारित करते रहेंगे। यह सच है कि जातिवाद से ग्रस्त बिहार की राजनीति पर विकास की राजनीति भारी पड़ती रही है। शायद यही वजह है कि नीतीश सरकार विकास पर जोर दे रही है और इसे ही अपना सियासी हथियार बनाने की तैयारी में है।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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