ऐसा वह पहले भी कहते रहे हैं कुछ दिन पहले फिर से कह दिया। चुने हुए शब्दों को घुमा फिरा दिया। सफल व्यक्ति ऐसा कह सकता है कि खुश रहने के लिए किसी वजह की ज़रूरत नहीं होती और दुखी होने का कोई न कोई कारण होता है। कैसी भी स्थिति हो बस खुश रहो। मुझे लगता है अगर वह इतने प्रसिद्ध न होते, सफल न होते और इतने लोकप्रिय न होते तो ऐसा कह न पाते। व्यावहारिक रूप से समझा जाए तो हर बात का कोई न कोई कारण माना जाता है। इतने उदास, बेजुबान, असुरक्षित, प्रतियोगी, भेदभाव पूर्ण सामाजिक वातावरण में कोई यूं ही खुश या नाखुश नहीं रह सकता। कहते हैं खुश रहना इंसानी स्वभाव है लेकिन अब क्यूंकि सदभाव कम होता जा रहा है इसलिए दुखी ज़्यादा रहते हैं।
जब आपको किसी चीज़ की ज़रूरत न हो उस स्थिति को उन्होंने खुशी माना लेकिन आजकल तो शिशु जन्म से पहले अभिभावकों को ज़रूरत होती है लड़की की नहीं बल्कि लड़के की। जब लड़की जन्म लेती है तो लड़का लड़की को बराबर मानने वालों के चेहरों पर उदासी चिपक जाती है। अब ऐसी स्थिति को खुशी तो नहीं कहते। सारा पंगा मन का किया धरा है, अगर मान ले कि सब प्रकृति की देन है तो ख़ुशी की स्थिति बन सकती है लेकिन ऐसा होता नहीं।
कहा जाता है कि हमारी प्रसन्नता दूसरों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। कोई आपको खुशी नहीं दे सकता और न ही दुःख दे सकता है। खुद को नासमझ मानकर भी मन को खुशी, शांति और विश्राम मिल सकता है लेकिन व्यवहारिक रूप से ऐसा भी नहीं होता। आजकल तो कोई खुद को किसी से कम नहीं समझता। समझदार तो कभी खुद को नासमझ नहीं मानेगा। हम तो दूसरों को परेशान करके खुश होना चाहते हैं और होते हैं। दूसरों के दुःख से हमें सुख मिलता है। हम अपने सुख से इतना सुखी नहीं होते जितना दूसरों के दुखों से होते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट हुआ कि हमारी अधिकांश प्रसन्नता दूसरों पर निर्भर है।
दुनिया में आए हैं तो पेट साथ आया है अगर खाने को नहीं मिलेगा तो कोई दूसरा काम कैसे कर पाएंगे। कहा भी तो गया है, ‘भूखे पेट न भजन न होए गोपाला’। पेट भरेगा तो थोड़ा खुश हो सकते हैं। ज़्यादा खुश होने के लिए ज़्यादा कमाना, बेहतर खाना ज़रूरी है। कपड़े पहनने भी ज़रूरी हैं। हर व्यक्ति हीरोइन नहीं होता कि कम कपड़े पहन लो। वैसे भी अब तो खुद को सबसे ज़्यादा अक़लमंद, ताकतवर, पहुंचवाला, जुगाड़ कर सकने वाला मानने का वातावरण है। एक दूसरे को कम से कम प्रयासों में, झूटमूट खुश रखने का मौसम है ताकि स्वार्थ पूरे हों। बिना मेहनत के काफी कुछ मिल जाए तो खुशी खुद चली आती है।
- संतोष उत्सुक