By अभिनय आकाश | Jan 05, 2021
अमिताभ बच्चन का एक बेहद मशहूर फिल्मी डायलॉग है…‘हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है।’ ऐसा ही कुछ बंगाल में ममता बनर्जी के लिए कहा जाता है। सूती साड़ी, पांव में चप्पल और चेहरे पर गंभीर मुस्कान। तुनकमिजाज, दयालु पर तीखे तेवर, बंगाल की शेरनी और लोगों की दीदी ममता बनर्जी अपने जीवन के 65 साल के सफर को पूरा कर रही हैं वो भी ऐसे वक्त में जब उन्हें अपने सियसी करियर के एक बड़े इम्तिहान से गुजरना पड़ रहा है। हालांकि ममता के सियासी सफर पर नजर डालें तो ये शुरूआत से ही चुनौतियों से भरा रहा है। ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता के बेहद ही मध्यम वर्गी इलाके कालीघाट के हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर हुआ। महज 17 साल की आयु में ममता बनर्जी के सिर से पिता का साया उठ गया। अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए ममता ने दूध बेचा था। हमेशा से सादगी जीवन जीने वाली ममता के सफेद सूती साड़ी और चप्पल का साथ आज तक कायम है। यूं तो ममता के राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आएं पर सक्रीय राजनीति की पुख्ता शुरुआत का साल 1984 का रहा जब ममता ने सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ जाधवपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया। तब ममता के इस निर्णय को लेकर तमाम तरह की अटकलें लग रही थी और लोगों को ऐसा लग रहा था की ममता इस हाई प्रोफाइल नेता के कद के सामने बौनी साबित होंगी। लेकिन ममता ने सारी अटकलों को धता बताते हुए जीत का परचम लहरा दिया।
ये लड़की आगे चलकर राजनीति के शिखर पर पहुंचेगी
साल 1983 के दौर में ममता बनर्जी की मुलाकात कांग्रेस वर्किग कमेटी की बैठक में हुई। ममता के पहले चुनाव में प्रणब मुखर्जी ने खुद उनके लिए कैंपेनिंग किया। चुनाव के दौरान ममता की जुझारू छवि और कड़ी मेहनत देखकर प्रणब दा ने उसी वक्त कह दिया था कि ये लड़की आगे चलकर राजनीति के शिखर पर पहुंचेगी।
नरसिम्हा राव सरकार से इस्तीफा
साल 1991 के चुनाव में ममता बनर्जी दोबारा सांसद बनीं। जिसके बाद नरसिम्हा राव सरकार में उन्हें खेल मंत्रालय का जिम्मा मिला। लेकिन दो साल के बाद ही खेल मंत्रालय के साथ खेल करने का आरोप लगाते हुए कोलकाता की ब्रिगेड परेड मैदान में रैली के दौरान ही मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके पांच साल बाद का वक्त ममता के राजनीतिक जीवन का सबसे अहम वर्ष रहा। 1998 में कांग्रेस पर माकपा के सामने हथियार डालने का आरोप लगाते हुए उन्होंने अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई। साल 2011 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अकेले अपने बल पर टीएमसी की सरकार प्रदेश में बनाई।
वैसे तो टी 20 क्रिकेट और चुनावों में कोई भविष्यवाणी करना खतरनाक है लेकिन पश्चिम बंगाल के बारे में एक बात तो साफ तौर पर कही जा सकती है कि ममता बनर्जी के लिए इस बार का विधानसभा चुनाव चुनौतियों से भरा जरूर है लेकिन उनकी मौजूदगी को इतनी आसानी से बंगाल की राजनीति में खारिज करना सभी दलों के लिए टेढ़ी खीर है।