समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत सिलसिलेवार ढंग से जो 'संवैधानिक ड्रामा' रचाया जा रहा या चल रहा है, इसके लिए सिर्फ और सिर्फ 'हमारी संसद' जिम्मेदार है, क्योंकि जनहित में प्रभावशाली कानून बनाने का जिम्मा उसी के ऊपर है। यदि उसने इस मामले में अबतक किसी तरह की कोई लापरवाही बरती है तो यह जन-बहस का मुद्दा है। इसलिए कुछ सुलगता हुआ सवाल यहां पर प्रासंगिक है!
लेकिन जब हम संसद की बात करते हैं तो इसकी सीधी जिम्मेदारी सत्तापक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधियों और उनके समूह की होती है। क्योंकि सत्ता की अदलाबदली प्रायः इन्हीं के बीच होती रहती है। संसद के अलावा, हमारी सिविल सोसाइटी, मीडिया मठाधीश, अधिवक्तागण, शिक्षाविद, प्रबुद्ध कारोबारी तबका एवं विभिन्न प्रकार के लोकतांत्रिक दबाव समूह भी इस स्थिति के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं, क्योंकि भले ही इनके पास कोई संवैधानिक शक्ति नहीं है या फिर अलग-अलग प्रकार की कानूनी सहूलियत प्राप्त है, लेकिन जनमत निर्माण में इनकी बहुत बड़ी भूमिका रहती आई है।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि समाज का यह जागरूक तबका और उनका जेबी संगठन राजनीतिक रूप से दलित-महादलित, ओबीसी-एमबीसी, सवर्ण-गरीब सवर्ण, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, आदिवासी-आर्य, अकलियत-पसमांदा, भाषा-क्षेत्र, अमीर--गरीब आदि विभिन्न गुटों में बंटा हुआ है, जो आभिजात्य वर्गीय सोच की हिफाजत का टूल्स बना दिया गया है।
वहीं, संसद द्वारा सही कानून बनवाने और बनाए हुए कानूनों को लागू करवाने में नौकरशाही की बड़ी भूमिका रहती है। जबकि इन कानूनों की न्यायसम्मत समीक्षा करने और मतभेद या विवाद की स्थिति में अंतिम निर्णय देने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है, जहां वकीलों की दलील के आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है। खास बात यह कि हमारी नौकरशाही के प्रशासनिक विवेक और न्यायपालिका के न्यायिक विवेक पर भी कोई सवाल उसी तरह से नहीं उठाया जा सकता है, जिस तरह से विधायिका के विधायी व प्रशासनिक विवेक और मीडिया के संपादकीय विवेक को मान्यता एवं संरक्षण प्राप्त है।
कहने का तातपर्य यह कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया का जागरूक और निष्पक्ष होना पहली शर्त है। मौजूदा दौर में 'धनपशुओं' से सहयोग प्राप्त सिविल सोसाइटी यानी समाजपालिका भी बहुत ताकतवर होकर उभरी है और सत्ता परिवर्तन में मुख्य भूमिका निभा रही है। हालांकि, इसके संकीर्ण सोच से भी समाज दिग्भ्रमित हुआ है।
आमतौर पर राजतंत्रीय सोच और सामंती विचारों से हमारा मौजूदा लोकतंत्र भी संक्रमित हो चुका है। तभी तो भूमि संपदा, मौद्रिक संपदा और स्वर्ण संपदा बनाने की होड़ हमारे माननीयों में मची रहती है। वहीं जो ज्ञान संपदा के धनी हैं, वे भी भूमि संपदा, मौद्रिक संपदा और स्वर्ण संपदा बनाने की होड़ में शामिल हो चुके हैं। अफसोस की बात यह है कि हमारा लोकतंत्र और संविधान ही इनकी अवैध और अकूत कमाई का हथकंडा बन चुका है और उच्चपदस्थ लोग इनके खिलाफ एकजूट नहीं हो रहे हैं।
यही वजह है कि जनता दिन-ब-दिन गरीब और उसके शासक लगातार अमीर होते जा रहे हैं। इनके अवैध धन से कहीं आतंकवादी, तो कहीं नक्सली व उग्रवादी फलफूल रहे हैं। भ्रष्टाचार, तस्करी, तबादला उद्योग, जघन्य हिंसा-प्रतिहिंसा आदि मानवता विरोधी नीतियों या कार्यों पर निर्णायक चेक एंड बैलेंस का विगत 8 दशकों में भी नहीं बनना इस पूरी व्यवस्था के लिए कलंक की बात है। आखिर अनवरत सांप्रदायिक दंगों और राजकोषीय लूट के लिए हमारी संसद नहीं तो कौन जिम्मेदार है, यक्ष प्रश्न है।
कम्पनी, फर्म, ट्रस्ट, एनजीओ आदि को अलग इकाई मानना और उनके दिवालिया व विफल होने पर उनके संचालकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई न होना, उनकी या उनसे लाभान्वित लोगों की अन्य सम्पत्तियों तक प्रशासनिक आंच का नहीं पहुंचना हमारी नीतिगत विफलता नहीं तो क्या है? आज भू-सम्पदाओं में जो धोखाधड़ी मची हुई है, मौद्रिक क्षेत्र में डिजिटल धोखाधड़ी लगातार बढ़ रही है, इसके लिए प्रशासनिक जवाबदेही कौन सुनिश्चित करेगा।
अनुभव बताता है कि पुलिसिया भ्रष्टाचार, तहसील कदाचार, न्यायिक जुल्म व लेटलतीफी, प्रशासनिक पक्षपात, सियासी अनैतिकता से समूचा समाज भयाक्रांत और परेशान है, लेकिन हमारे माननीयों को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास नहीं है। या वैसा कोई सजग व्यक्ति या समूह भी नहीं है जो इन लोकतांत्रिक महावीरों को उनकी मौलिक शक्ति का एहसास दिलाए।
सवाल किसी जज की कोठी में भारी मात्रा में नोटों के मिलने का नहीं है और न ही उसके खिलाफ लीपापोती वाली प्रक्रिया शुरू करने का है, बल्कि सुलगता हुआ सवाल यह है कि व्यवस्था के ऐसे जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में हमारी संवैधानिक व्यवस्था कितनी असहाय प्रतीत होती आई है और आज तक उसका सार्थक और सकारात्मक हल नहीं ढूंढा जा सका है।
आपने देखा सुना होगा कि देश को लूटने वाले विदेशों में बस रहे हैं। ऐसे लोग हमारी कानूनी खामियों का फायदा उठाकर विदेशों में मौज कर रहे हैं, क्योंकि उनको परोक्ष सियासी शह व सहूलियत दोनों प्राप्त है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि यदि मौजूदा लोकतांत्रिक व संवैधानिक व्यवस्था जनता की सुख-शांति-समृद्धि सुनिश्चित नहीं कर सकती हैं तो फिर उसके होने या न होने का क्या मतलब रह जाता है। इस नजरिए से आधुनिक लोकतंत्र भी अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है और पूंजीपतियों के नेतृत्व वाली नई विश्व व्यवस्था आकार ले रही है, जिससे आमलोगों की त्रासदी और बढ़ेगी!
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक